बुधवार, 4 दिसंबर 2013

मै तरन्नुम में गा रहा था मरसिया ।
उसने मोहब्बत का पैगाम बना दिया ।।
       समंदर पुकारता है रोज़ दीवानों सा ।
       कतरा कतरा करके मुझे दरिया बना दिया ।।
 उसके इषारे से चलती और रुकती है दुनिया
 इंसा की इसी खुषख़याली ने भगवान बना दिया ।।
      हसीनों के जलवों से रिसाले भरे पड़े है ।
      तेरी तो एक तबस्सुुम ने दीवाना बना दिया ।।
 सनम को बेवफ़ा कहने को दिल नहीं करता ।
लो उस बेवफ़ा ने हमें ही बेवफ़ा बना दिया ।।
      अटक-अटक के लिखते रहे दास्ताने जि़ंदगी ।
      हर दौरा ए तूफ़ा ने शायर बना दिया ।।
न अहसास न तमन्नाए मैं तो बुत था ।
उसने छूकर मुझे इंसा बना दिया ।।
    आलोक मिश्रा  

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