मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

वो कहां गया ....

जीवन की आपाधापी में वो कहां गया, वो किधर गया ।
वो सखा बचपन का था वो कहां गया,वो किधर गया ।।
         वो साथ ही मेरे हंसता था ।
         वो मेरे साथ ही रोता था  ।
         वो सोता था तो दिखता था ।
         वो उठता था तो दिखता था ।
वो चेहरा था अनमोल न जाने कहां गया, वो किधर गया ।।
         वो साथ ही खेला करता था ।
         वो साथ ही लड़ता रहता था ।
         वो छीन के मुझसे खाता था ।
         मंै उसको मारा करता था  ।
वो पेट की आग बुझाने को न जाने कहां गया, वो किधर गया ।।
         वो चोर तो मंसिपाही बन जाता ।
         वो राजा तो मंै मंत्री कहलाता  ।
         वो मेरे कंचें तोड़ा करता था ।
         वो मेरे भौरे फोड़ा करता था ।
वो खेलों की मस्त ड़गर छोड़ न जाने  कहां गया, वो किधर गया ।।
         वो अमरार्इ में आमों सा ।
          वो बेरियों में कांटों सा  ।
        वो कटहल की भीनी खुशबू सा ।
      वो चार की दोहरी परतों सा ।
वो हम चोरों के इस उपवन को छोड़ न जाने कहां गया, वो किधर गया ।।
      वो मिला अचानक चौराहे पर ।
      वो गले लग कर रोया था    ।
      वो खुशबू खुली छोड़ गया था ।
      वो यादें ताजा कर गया था   ।
वो यादों के समंदर में छोड़ न जाने कहां गया, वो किधर गया ।।
जीवन की आपाधापी में वो कहां गया, वो किधर गया ।
वो सखा बचपन का था वो कहां गया, वो किधर गया ।।
                                 आलोक मिश्रा

बुधवार, 11 दिसंबर 2013

बोलो मैने क्या अपराध किया है ...

 बोलो मैने क्या अपराध किया है ...
  तेरे  रक्त  ने  मुझको  सींचा  है ।
  तेरी  कोख  ने मुझको  भींचा  है ।
  तेरे प्रेम की छाया मुझे भी है प्यारी ।
  पर  तेरी  है  ये  कैसी  लाचारी ।
  जो मुझे अजन्मे का क्यों दण्ड दिया है ?
         बोलो मैंने क्या अपराध किया है ...?
 तू मेरी प्यारी - प्यारी महतारी  है ।
ये तेरी शापित अजन्मी बिटिया प्यारी है ।
मैं  तेरे मन  उपवन  को  महकाउंगी ।
खुषबू  बन  सब  पर  छा  जाउंगी ।
पर  तूने  मुझे  क्यों त्याग दिया है  ?
      बोलो मैंने क्या अपराध किया है ...?
तू मेरी मुझ में तेरा  ही अंष है ।
बापू से कहना ये भी तेरा वंष है ।
बचा ले मुझको मैं तेरी हो जाउंगी ।
बैठ तेरे  संग  बन्ना  मं गाउंगी ।
फिर तूने क्यों लाचारी का पैगाम दिया है?
         बोलो मैंने क्या अपराध किया है ...?
तेरा  वजूद  तेरी  मां  का  है ।
तुझ पर एहसान नानी मां का है ।
तू एहसान उतारेगी मैं मुस्काउंगी ।
तेरी गोद में किलकारी भर पाउंगी ।
पर तूने क्यों नानी मां को भुला दिया ?
          बोलो मैंने क्या अपराध किया है ...?

        आलोक मिश्रा

रविवार, 8 दिसंबर 2013

 आजकल एक हंगामा सा बरपा है । पिछले कुछ दिनों से जिसे देखिए एक ही बात करता है और बात है .... चुनाव की । चुनाव की घोषणा के साथ ही आचार संहिता में प्रशासकीय कसावट जनता में चर्चा का विषय बनी रही । कुछ लोग कहने लगे कि काश.......! आचार संहिता हमेशा के लिए लागू हो जाती ,लेकिन जनता की सुनता ही कौन है । कुछ लोग तो यह भी कहते पाए गए कि अभी आचार संहिता और बाद में भ्रष्टाचार संहिता के अनुसार सब काम होते है । इसी समय नेताओं और पार्टियों के टिकट वितरण पर  भी सभी चटकारे ले कर चर्चा करते रहे । चुनाव के दौरान जीत-हार के दावे मनोरंजन का विषय बने रहे । अब जनता ने नेताओं और पार्टियों के सारे हथकंड़ों के बीच आखिरकार अपना फैसला दे ही दिया है ।
     जनता के फैसले के बाद कयास लगाने वाले ज्योतिषियों की तो जैसे बहार ही आ गर्इ है । गली-मोहल्ले,चाय-पान ठेले और घर - आफिस में भी  जीत-हार का अनुमान लगाने वाले ज्योतिषी अपनी महारत दिखाते देखे जा सकते है । इसी काम को बड़े रुप में विभिन्न सैफोलाजिस्ट चैनलों के लिए करके उनकी टी.आर.पी बढाने का काम कर रहे है । इस समय चुनाव लड़ने वाले नेताओं के दिन बहुत ही मुशिकल से गुजर रहे है । वे रोज ही छोटे-छोटे ग्राम स्तर के कार्यकर्ताओं से अनुमान ले कर अपनी जीत के प्रति आश्वस्त होने का प्रयास करते है । ऐसे नेता रातों को सोते-सोते उठ जाते है और कर्इ घंटों तक बैठ कर किसी जुआंड़ी की तरह हिसाब-किताब करके जीत का आंकड़ा निकालने की कोशिश करते रहते है । कुछ नेता अपने आपको बेफिक्र दिखाने का प्रयास भी करते दिखते है । कुछ तो ऐसे भी है जिन्हें पहले से ही मालूम है कि वे मुकाबले में है ही नहीं इसलिए उन्हे कोर्इ फर्क नहीं पड़ता लेकिन फिर भी कभी-कभी ही सही, पूरे मन से न सही ;वे अपनी जीत का दावा करने से नहीं चूकते । कार्यकर्ता को जो मिलना था मिल चुका ;अब वे उस मिले हुए का ऋण चुकाने के  लिए ही बार-बार अपने नेता की जीत की दुहार्इ देते है ।
         अब आज परीक्षाफल ..............मतगणना का दिन है  । रात को सो न पाने के कारण नेताजी की आंखें सूजी हुर्इ है । वे सुबह जल्दी उठ गए (सोए ही कहां थे ) । उनकी तैयारी रिजल्ट लेने के लिए जाने वाले बच्चे की ही तरह है । वे नहा-धोकर पूजा-पाठ के लिए बैठे है । आज की पूजा कुछ अधिक ही लम्बी है । उन्हें लगता है कि भगवान अभी भी कुछ कर सकता है जबकी उनकी किस्मत का फैसला तो जनता रुपी भगवान के द्वारा पहले ही किया जा चुका है । वे साफ धुले कपड़े  पहन कर तैयार तो हो गए फिर सोच रहे है कि स्कूल (मतगणना स्थल ) जाए या नहीं ? कुछ ने सोचा प्रारम्भ से ही जाना चाहिए और कुछ ने सोचा  कि एक-दो राउण्ड के बाद देखते है जाना भी चाहिए या नहीं ? चमचों की भीड़ के साथ कुछ तो पहुचे और  कुछ ने अपने चमचों को ही मोबार्इल से लैस करके भेज दिया । भारी सुरक्षा के बीच प्रशासन बड़ी ही मुस्तैदी के साथ गणना में जुटा है। काश........कभी आम आदमी के लिए भी प्रशासन इतना ही मुस्तैद होता । बाहर भारी भीड़ के रुप में चमचों और तमाशबीनों ने खोमचों , पान ठेलों और चाय ठेलों पर ड़ेरा जमा रखा है । वे चर्चाओं में लगे है । अब वे पार्टी की मर्यादाओं को तोड़कर भी बात कर रहे है । वे कभी बडडे को जिताने लगते है , कभी पहलवान को और कभी बार्इ जी को । वे समय बिताने के लिए चुनाव प्रचार के दौरान किए गए मज़ों और लेन-देन की भी चर्चा करने लगते है । इस भीड़ में जब भी कोर्इ नया व्यकित आता है तो पूछता है '' कौन जीत रहा है ?  ,आजू- बाजू वाले उसे अपने पास उपलब्ध जानकारी किसी चैनल की ब्रेकिंग न्यूज की तरह देते है और वो भी भीड़ का हिस्सा बन जाता है । बहुत से लोग अपने-अपने घरों में ही टी.व्ही. के सामने भजिया खाते और चाय पीते हुए वन डे मैच जैसा आनन्द प्राप्त कर रहे है । एक-दो राउण्ड की गणना के पश्चात कुछ नेता जो गणना स्थल पर आए थे जाने लगते है तो कुछ जो घरों मे  बैठे थे आने की तैयारी करने लगते है । इस समय आगे चल रहे उम्मीदवार के अतिउत्साही चमचे मिठार्इ, फटाके और बैण्ड आदि की व्यवस्था करने में जुट जाते है । इस पूरे   के बीच भी कुछ समझदार चमचे ये सारी व्यवस्थाएं वापसी के एग्रीमेन्ट के साथ ही करते है क्योकि यदि अंत में हार ही गए तो ........ पैसे क्यों बरबाद हों । शहर में एक बैण्ड वाले बड़े ही सयाने  है,वे बिना बुलाए ही सुबह से ही गणना स्थल पर पहुच गए है और हर राउण्ड में आगे चल रहे उम्मीदवार के चमचों से पैसे ले कर ही बैण्ड बजाते है । उन्होने पहले बडडे का बैण्ड बजाया ,फिर दादा का और अभी बार्इ जीे का बैण्ड बजा रहे है । उनके जैसी तठस्थता तो खोज  का विषय ही है ।
                कयासों की धुंध अब धीरे-धीरे छटने लगीे है । अगले पांच वषोर्ं तक जनता को किसकी बात सुननी पड़ेगी ,इसका चुनाव जनता ने कर ही लिया है । अब राजा साहब शराब के नशे में नाचते अपने चटटे-बटटों के साथ जुलूस की शक्ल में जनता को दर्शन देने निकलेंगे । अब वे लोग भी हार पहनाऐंगे,हाथ मिलाऐगें और मिठार्इ बाटेंगें जिन्हे भविष्य में उनसे काम पड़ने की आशंका है ।
                 तो साहब चुनाव का नशा उतर गया हों तो अपने-अपने काम-धंधों में लग जाओ क्योंकि नेताजी तो राजधानी के लिए निकल गए ।
                                                          आलोक मिश्रा

शुक्रवार, 6 दिसंबर 2013

मित्र

 जब भी पास किसी के जाओ ,
        उसको अपना मित्र बनाओ ।
सच है वो भी शत्रु बनेगा ,
            पर तुम दोषी क्यों कहलाओ 


गुरुवार, 5 दिसंबर 2013

बेकार हुआ ............

बेकार हुआ ............

जिंदगी की बज़्म में हर साज़ बेकार हुआ ।
लगाए जो प्रेम राग हर अहसास बेकार हुआ।।
           खुद को तलाषते रहे जिंदगी की राहों में ।
           तकाज़ा ए उसूल खुदा से था बेकार हुआ ।।
जज़्बाते  रोषनार्इ  से  लिखते  रहे  रोज़ ब रोज़ ।
बज़्म में दीद,न वाह ,न आह मिली सब बेकार हुआ ।।
           दर  खुदा  का  सर  मेरा  मिलते  थे   रोज़ ।
           दुनियादारी से गया न मिला खुदा सब बेकार हुआ।।
सोचा था भूल जाएंगे उस बेवफा को हम ।
रोज़ ही आती रही याद सब बेकार  हुआ ।।
           वफा का  सिला  ही गर मिल जाता हमें ।
           मोहब्बत में खुषनुमा वहम था बेकार हुआ ।।
रहनुमा थे  वो  मुल्को अवाम के ।
बुत चौराहे पे फ़ल्सफा बेकार हुआ ।।
           
                           आलोक मिश्रा

बुधवार, 4 दिसंबर 2013

मै तरन्नुम में गा रहा था मरसिया ।
उसने मोहब्बत का पैगाम बना दिया ।।
       समंदर पुकारता है रोज़ दीवानों सा ।
       कतरा कतरा करके मुझे दरिया बना दिया ।।
 उसके इषारे से चलती और रुकती है दुनिया
 इंसा की इसी खुषख़याली ने भगवान बना दिया ।।
      हसीनों के जलवों से रिसाले भरे पड़े है ।
      तेरी तो एक तबस्सुुम ने दीवाना बना दिया ।।
 सनम को बेवफ़ा कहने को दिल नहीं करता ।
लो उस बेवफ़ा ने हमें ही बेवफ़ा बना दिया ।।
      अटक-अटक के लिखते रहे दास्ताने जि़ंदगी ।
      हर दौरा ए तूफ़ा ने शायर बना दिया ।।
न अहसास न तमन्नाए मैं तो बुत था ।
उसने छूकर मुझे इंसा बना दिया ।।
    आलोक मिश्रा  

मंगलवार, 3 दिसंबर 2013

                 कहीं कोई रास्‍ता  खत्‍म  नहीं  होता ।                                   कहीं  कोई  लक्ष्‍य  अंतिम नहीं होता।                                   अरमानों    के  बेचैन  आकाश  में ।                                    कहीं कोई मुकम्‍मिल जहां नहीं होता ।

कुछ दोस्‍त थे कुछ रिश्‍ते अपनी पारी निभा गए ।                                 कुछ दीगर आए एहसानों के तीर चला  गए  ।

जो भी चाहा जो भी सोचा हमने हो न सका ।                         

          कुछ  हालात  थे  दुनियादारी   सिखा गए ।

चुनावी कांव- कांव

            आजकल चुनावी वातावरण है । हर तरफ चुनावी खिचड़ी,पुलाव और बिरयानी पक रही है । नेताओं ने पारंपरिक सुअर पार्टी और गधा पार्टी का टिकट प्राप्त करने के लिए एड़ी- चोटी लगा दी ।  सफलता  तो एक-एक को ही मिलनी थी , शेष सब असफल हो गए । असफल लोगों के लिए विकल्प खुले थे वे चाहें तो पार्टी में रहते हुए उसका कबाड़ा कर सकते थे या निर्दलीय खड़े हो कर शकित प्रदर्शन कर सकते थे । ऐसे लोगों के पास दूसरी पार्टियों जैसे उल्लू पार्टी , गिद्ध पार्टी और जूता पार्टियों के विकल्प भी  है । वास्तव में राजनीति कभी भी र्निविकल्प नहीं होती । जिन लोगों ने अपनी अपनी खेमेबाजी, चालबाजी और कलाबाजियों से टिकट का जुगाड़ कर ही लिया है अब वे ही असंतुष्टों को मनाने में लगे है । असंतुष्ट भी रुठी पत्नी की तरह बिना कुछ लेन-देन के कहां मानते है । 
        चुनावी संग्राम का बिगुल बज गया । छोटे कार्यकर्ता अपनी खिचड़ी पकाने में लगे है । सुबह के समय वे गधा पार्टी के दफतर में हेाते है तो शाम को वे सुअरों के साथ घूम रहे होते है । ऐसे कार्यकर्ता तो केवल टोपी और गमछे बदल कर इस अवसर को रोजगार के रुप में देखते है और कुछ कमा लेना चाहते है । पार्टियों को भी भाड़े की भीड की आवश्यकता होती है सो दोनों अपने-अपने कामों को साधने में लग जाते है । इस महासमर में सभी सेनाएं तैयार हो चुकी है । इन सेनाओं के प्रमुख एक दूसरे पर आरोपों के तीर चलाने लगे है । ये आरोप उन्हें पिछले पांच सालों में दिखार्इ नहीं दिए थे । इस युद्ध की भीषणता का अंदाज चर्चाओं, रैलियों और प्रचार से होने लगता है । अब इनके प्रचार और भाषणों से यह मालूम होता है कि हम जनता को क्या कुछ मिलना चाहिए था मगर मिल नहीं पाया । वादों की घनघोर वर्षा के बीच यह समझना कठिन हो जाता है कि कौन सही है और कौन गलत । हेलीकाप्टर वालों की रैलियों को छोटे शहरों में बहुत सफलता प्राप्त होती है । हमारे लल्लन जी एक ऐसी ही रैली से लौटे तो हमने पूछा '' रैली में क्या हुआ ? वे बोले ''अरे .... मिश्राजी... आज हमने हेलीकाप्टर देखा ..... सच में बहुत ही बड़ा था । हमने पूछा ''नेताजी क्या बोले ? वे अपनी ही धुन में थे ,बोले '' नेता क्या बोलते है ? वे जब हेलीकाप्टर से उतरे तो हमने देखा कि अंदर सोफे लगे है ।  हमें ऐसी रैलियों की सफलता का राज़ समझ में आ गया । 
        निर्दलीय नेकीराम बेचारे अब चुनाव में खड़े हो कर भी पछता रहे है । कल वे भी मिल ही गए तो हम पूछ ही बैठे '' इस बार कैसे खड़े हो गए ? वे बोले ''हमें पता लगा था कि बैठने के भी पैसे मिलते है । हम बीच में ही बोल पड़े '' फिर ......। वे बोले '' फिर क्या......? हमें कोर्इ बैठालने के लिए आया ही नहीं । बस अब हम खड़े है ।  हम सोचने लगे कि जिन्हे अपने ही परिवार के भी चार वोट पूरे न मिलने वाले हो उन्हें कोर्इ क्यों बैठाने के लिए पैसे देगा । 
           चुनावों का वातावरण बहुत ही मजेदार होता है । आप कहीं भी निकल जाऐं कोर्इ परिचित हो या अपरिचित बस एक जुमला उछाल दीजिए '' किसका जोर चल रहा है ? बस किसी चैनल के वाद-विवाद की ही तरह चर्चा प्रारम्भ हो जाती है । 
पहला कहता है '' सुअर का जोर है ।
दूसारा बोला '' कैसे मुझे तो नहीं लगता ।
पहला पूरी विद्वता के साथ बताता है '' सुअरों की संख्या अधिक है तो उन्हें जातिगत लाभ मिल रहा है और दूसरा कोर्इ जाति वाला न खड़ा होने से भी सुअर के जीतने के चांस अधिक है । 
तीसरा जो अब तक चुप था चर्चा में कूद पड़ा ''लेकिन सुअर ने किया ही क्या है ?
पहला फिर शुरु हो गया '' देखिए चुनाव में कोर्इ काम-वाम नहीं देखता । फिर वे हर शादी- ब्याह और जलसों में नाचे भी तो बहुत है ।  
दूसरा बोला '' लेकिन गधा भी तो कोर्इ कम नहीं ।
चौथा जो अब तक खामोश था बोला '' गधे की पार्टी वाले ही उसे धोखा दे रहे है । उसके पास तो कार्यकर्ता ही नही है । उसे तो लोग डमी मानते है । 
पहला पक्का सुअरवादी था बोला '' नहीं....नहीं सुअर की टक्कर गधे से ही है ।  
दूसरा बोला '' लेकिन मैने सुना है कि गिद्ध इन दोनों पर भारी पड़ रहा है । 
तीसरा बोला '' हां.... हां  मुझे भी लगता है कि गिद्ध , सुअर और गधे को पीछे छोड़ देगा । 
पहला फिर विद्वान बन गया और तेज-तेज बोलने लगा '' ये सब फालतू की बाते है गधा और गिद्ध एक ही जाति के है तो इनके वोट आपस में कट जाएंगें । जीत तो सुअर की ही होनी है । 
चौथा बोला '' जाति -जाति तो क्या दूसरे लोग तेल लेने जाएंगें ? 
            ऐसी चर्चाऐं कभी पूरी नहीं हो पाती है। इनमें कुछ लोग तो अपना काम ही कर रहे होते है याने प्रचार और कुछ लोग जनता की नब्ज़ टटोलने की कोशिश कर रहे होते है । ऐसी चर्चाऐं गली ,मोहल्ले और नुक्कड़ों पर आज कल आम है । यहां हम ऐसी ही चर्चाओं से अपने शहर का मुड़ समझने की कोशिश पिछले कर्इ दिनों से कर रहे है और बड़ी-बड़ी चैनल वाले न जाने कब आकर सर्वे करके चले गए ? अब  हमें एक बताता  है कि सुअरों का बहुमत होगा और दूसरा गधों का तीसरा गिद्धों के सहयोग से सरकार बनाने की बात करता है । ऐसे अदृश्य सर्वे वाले न जाने कैसे इतने अच्छे ज्योतिष हो जाते है ? न जान हमें कौन धोखा दे रहा  नेता ,पार्टी या ये चैनल वाले ? ऐसा भी तो हो सकता है कि सब मिल कर हमें धोखा दे रहे हो ? बस अब सोच समझ कर मतदान करना ही हमारे हाथ में है।

                                    आलोक मिश्रा