मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

वो कहां गया ....

जीवन की आपाधापी में वो कहां गया, वो किधर गया ।
वो सखा बचपन का था वो कहां गया,वो किधर गया ।।
         वो साथ ही मेरे हंसता था ।
         वो मेरे साथ ही रोता था  ।
         वो सोता था तो दिखता था ।
         वो उठता था तो दिखता था ।
वो चेहरा था अनमोल न जाने कहां गया, वो किधर गया ।।
         वो साथ ही खेला करता था ।
         वो साथ ही लड़ता रहता था ।
         वो छीन के मुझसे खाता था ।
         मंै उसको मारा करता था  ।
वो पेट की आग बुझाने को न जाने कहां गया, वो किधर गया ।।
         वो चोर तो मंसिपाही बन जाता ।
         वो राजा तो मंै मंत्री कहलाता  ।
         वो मेरे कंचें तोड़ा करता था ।
         वो मेरे भौरे फोड़ा करता था ।
वो खेलों की मस्त ड़गर छोड़ न जाने  कहां गया, वो किधर गया ।।
         वो अमरार्इ में आमों सा ।
          वो बेरियों में कांटों सा  ।
        वो कटहल की भीनी खुशबू सा ।
      वो चार की दोहरी परतों सा ।
वो हम चोरों के इस उपवन को छोड़ न जाने कहां गया, वो किधर गया ।।
      वो मिला अचानक चौराहे पर ।
      वो गले लग कर रोया था    ।
      वो खुशबू खुली छोड़ गया था ।
      वो यादें ताजा कर गया था   ।
वो यादों के समंदर में छोड़ न जाने कहां गया, वो किधर गया ।।
जीवन की आपाधापी में वो कहां गया, वो किधर गया ।
वो सखा बचपन का था वो कहां गया, वो किधर गया ।।
                                 आलोक मिश्रा

बुधवार, 11 दिसंबर 2013

बोलो मैने क्या अपराध किया है ...

 बोलो मैने क्या अपराध किया है ...
  तेरे  रक्त  ने  मुझको  सींचा  है ।
  तेरी  कोख  ने मुझको  भींचा  है ।
  तेरे प्रेम की छाया मुझे भी है प्यारी ।
  पर  तेरी  है  ये  कैसी  लाचारी ।
  जो मुझे अजन्मे का क्यों दण्ड दिया है ?
         बोलो मैंने क्या अपराध किया है ...?
 तू मेरी प्यारी - प्यारी महतारी  है ।
ये तेरी शापित अजन्मी बिटिया प्यारी है ।
मैं  तेरे मन  उपवन  को  महकाउंगी ।
खुषबू  बन  सब  पर  छा  जाउंगी ।
पर  तूने  मुझे  क्यों त्याग दिया है  ?
      बोलो मैंने क्या अपराध किया है ...?
तू मेरी मुझ में तेरा  ही अंष है ।
बापू से कहना ये भी तेरा वंष है ।
बचा ले मुझको मैं तेरी हो जाउंगी ।
बैठ तेरे  संग  बन्ना  मं गाउंगी ।
फिर तूने क्यों लाचारी का पैगाम दिया है?
         बोलो मैंने क्या अपराध किया है ...?
तेरा  वजूद  तेरी  मां  का  है ।
तुझ पर एहसान नानी मां का है ।
तू एहसान उतारेगी मैं मुस्काउंगी ।
तेरी गोद में किलकारी भर पाउंगी ।
पर तूने क्यों नानी मां को भुला दिया ?
          बोलो मैंने क्या अपराध किया है ...?

        आलोक मिश्रा

रविवार, 8 दिसंबर 2013

 आजकल एक हंगामा सा बरपा है । पिछले कुछ दिनों से जिसे देखिए एक ही बात करता है और बात है .... चुनाव की । चुनाव की घोषणा के साथ ही आचार संहिता में प्रशासकीय कसावट जनता में चर्चा का विषय बनी रही । कुछ लोग कहने लगे कि काश.......! आचार संहिता हमेशा के लिए लागू हो जाती ,लेकिन जनता की सुनता ही कौन है । कुछ लोग तो यह भी कहते पाए गए कि अभी आचार संहिता और बाद में भ्रष्टाचार संहिता के अनुसार सब काम होते है । इसी समय नेताओं और पार्टियों के टिकट वितरण पर  भी सभी चटकारे ले कर चर्चा करते रहे । चुनाव के दौरान जीत-हार के दावे मनोरंजन का विषय बने रहे । अब जनता ने नेताओं और पार्टियों के सारे हथकंड़ों के बीच आखिरकार अपना फैसला दे ही दिया है ।
     जनता के फैसले के बाद कयास लगाने वाले ज्योतिषियों की तो जैसे बहार ही आ गर्इ है । गली-मोहल्ले,चाय-पान ठेले और घर - आफिस में भी  जीत-हार का अनुमान लगाने वाले ज्योतिषी अपनी महारत दिखाते देखे जा सकते है । इसी काम को बड़े रुप में विभिन्न सैफोलाजिस्ट चैनलों के लिए करके उनकी टी.आर.पी बढाने का काम कर रहे है । इस समय चुनाव लड़ने वाले नेताओं के दिन बहुत ही मुशिकल से गुजर रहे है । वे रोज ही छोटे-छोटे ग्राम स्तर के कार्यकर्ताओं से अनुमान ले कर अपनी जीत के प्रति आश्वस्त होने का प्रयास करते है । ऐसे नेता रातों को सोते-सोते उठ जाते है और कर्इ घंटों तक बैठ कर किसी जुआंड़ी की तरह हिसाब-किताब करके जीत का आंकड़ा निकालने की कोशिश करते रहते है । कुछ नेता अपने आपको बेफिक्र दिखाने का प्रयास भी करते दिखते है । कुछ तो ऐसे भी है जिन्हें पहले से ही मालूम है कि वे मुकाबले में है ही नहीं इसलिए उन्हे कोर्इ फर्क नहीं पड़ता लेकिन फिर भी कभी-कभी ही सही, पूरे मन से न सही ;वे अपनी जीत का दावा करने से नहीं चूकते । कार्यकर्ता को जो मिलना था मिल चुका ;अब वे उस मिले हुए का ऋण चुकाने के  लिए ही बार-बार अपने नेता की जीत की दुहार्इ देते है ।
         अब आज परीक्षाफल ..............मतगणना का दिन है  । रात को सो न पाने के कारण नेताजी की आंखें सूजी हुर्इ है । वे सुबह जल्दी उठ गए (सोए ही कहां थे ) । उनकी तैयारी रिजल्ट लेने के लिए जाने वाले बच्चे की ही तरह है । वे नहा-धोकर पूजा-पाठ के लिए बैठे है । आज की पूजा कुछ अधिक ही लम्बी है । उन्हें लगता है कि भगवान अभी भी कुछ कर सकता है जबकी उनकी किस्मत का फैसला तो जनता रुपी भगवान के द्वारा पहले ही किया जा चुका है । वे साफ धुले कपड़े  पहन कर तैयार तो हो गए फिर सोच रहे है कि स्कूल (मतगणना स्थल ) जाए या नहीं ? कुछ ने सोचा प्रारम्भ से ही जाना चाहिए और कुछ ने सोचा  कि एक-दो राउण्ड के बाद देखते है जाना भी चाहिए या नहीं ? चमचों की भीड़ के साथ कुछ तो पहुचे और  कुछ ने अपने चमचों को ही मोबार्इल से लैस करके भेज दिया । भारी सुरक्षा के बीच प्रशासन बड़ी ही मुस्तैदी के साथ गणना में जुटा है। काश........कभी आम आदमी के लिए भी प्रशासन इतना ही मुस्तैद होता । बाहर भारी भीड़ के रुप में चमचों और तमाशबीनों ने खोमचों , पान ठेलों और चाय ठेलों पर ड़ेरा जमा रखा है । वे चर्चाओं में लगे है । अब वे पार्टी की मर्यादाओं को तोड़कर भी बात कर रहे है । वे कभी बडडे को जिताने लगते है , कभी पहलवान को और कभी बार्इ जी को । वे समय बिताने के लिए चुनाव प्रचार के दौरान किए गए मज़ों और लेन-देन की भी चर्चा करने लगते है । इस भीड़ में जब भी कोर्इ नया व्यकित आता है तो पूछता है '' कौन जीत रहा है ?  ,आजू- बाजू वाले उसे अपने पास उपलब्ध जानकारी किसी चैनल की ब्रेकिंग न्यूज की तरह देते है और वो भी भीड़ का हिस्सा बन जाता है । बहुत से लोग अपने-अपने घरों में ही टी.व्ही. के सामने भजिया खाते और चाय पीते हुए वन डे मैच जैसा आनन्द प्राप्त कर रहे है । एक-दो राउण्ड की गणना के पश्चात कुछ नेता जो गणना स्थल पर आए थे जाने लगते है तो कुछ जो घरों मे  बैठे थे आने की तैयारी करने लगते है । इस समय आगे चल रहे उम्मीदवार के अतिउत्साही चमचे मिठार्इ, फटाके और बैण्ड आदि की व्यवस्था करने में जुट जाते है । इस पूरे   के बीच भी कुछ समझदार चमचे ये सारी व्यवस्थाएं वापसी के एग्रीमेन्ट के साथ ही करते है क्योकि यदि अंत में हार ही गए तो ........ पैसे क्यों बरबाद हों । शहर में एक बैण्ड वाले बड़े ही सयाने  है,वे बिना बुलाए ही सुबह से ही गणना स्थल पर पहुच गए है और हर राउण्ड में आगे चल रहे उम्मीदवार के चमचों से पैसे ले कर ही बैण्ड बजाते है । उन्होने पहले बडडे का बैण्ड बजाया ,फिर दादा का और अभी बार्इ जीे का बैण्ड बजा रहे है । उनके जैसी तठस्थता तो खोज  का विषय ही है ।
                कयासों की धुंध अब धीरे-धीरे छटने लगीे है । अगले पांच वषोर्ं तक जनता को किसकी बात सुननी पड़ेगी ,इसका चुनाव जनता ने कर ही लिया है । अब राजा साहब शराब के नशे में नाचते अपने चटटे-बटटों के साथ जुलूस की शक्ल में जनता को दर्शन देने निकलेंगे । अब वे लोग भी हार पहनाऐंगे,हाथ मिलाऐगें और मिठार्इ बाटेंगें जिन्हे भविष्य में उनसे काम पड़ने की आशंका है ।
                 तो साहब चुनाव का नशा उतर गया हों तो अपने-अपने काम-धंधों में लग जाओ क्योंकि नेताजी तो राजधानी के लिए निकल गए ।
                                                          आलोक मिश्रा

शुक्रवार, 6 दिसंबर 2013

मित्र

 जब भी पास किसी के जाओ ,
        उसको अपना मित्र बनाओ ।
सच है वो भी शत्रु बनेगा ,
            पर तुम दोषी क्यों कहलाओ 


गुरुवार, 5 दिसंबर 2013

बेकार हुआ ............

बेकार हुआ ............

जिंदगी की बज़्म में हर साज़ बेकार हुआ ।
लगाए जो प्रेम राग हर अहसास बेकार हुआ।।
           खुद को तलाषते रहे जिंदगी की राहों में ।
           तकाज़ा ए उसूल खुदा से था बेकार हुआ ।।
जज़्बाते  रोषनार्इ  से  लिखते  रहे  रोज़ ब रोज़ ।
बज़्म में दीद,न वाह ,न आह मिली सब बेकार हुआ ।।
           दर  खुदा  का  सर  मेरा  मिलते  थे   रोज़ ।
           दुनियादारी से गया न मिला खुदा सब बेकार हुआ।।
सोचा था भूल जाएंगे उस बेवफा को हम ।
रोज़ ही आती रही याद सब बेकार  हुआ ।।
           वफा का  सिला  ही गर मिल जाता हमें ।
           मोहब्बत में खुषनुमा वहम था बेकार हुआ ।।
रहनुमा थे  वो  मुल्को अवाम के ।
बुत चौराहे पे फ़ल्सफा बेकार हुआ ।।
           
                           आलोक मिश्रा

बुधवार, 4 दिसंबर 2013

मै तरन्नुम में गा रहा था मरसिया ।
उसने मोहब्बत का पैगाम बना दिया ।।
       समंदर पुकारता है रोज़ दीवानों सा ।
       कतरा कतरा करके मुझे दरिया बना दिया ।।
 उसके इषारे से चलती और रुकती है दुनिया
 इंसा की इसी खुषख़याली ने भगवान बना दिया ।।
      हसीनों के जलवों से रिसाले भरे पड़े है ।
      तेरी तो एक तबस्सुुम ने दीवाना बना दिया ।।
 सनम को बेवफ़ा कहने को दिल नहीं करता ।
लो उस बेवफ़ा ने हमें ही बेवफ़ा बना दिया ।।
      अटक-अटक के लिखते रहे दास्ताने जि़ंदगी ।
      हर दौरा ए तूफ़ा ने शायर बना दिया ।।
न अहसास न तमन्नाए मैं तो बुत था ।
उसने छूकर मुझे इंसा बना दिया ।।
    आलोक मिश्रा  

मंगलवार, 3 दिसंबर 2013

                 कहीं कोई रास्‍ता  खत्‍म  नहीं  होता ।                                   कहीं  कोई  लक्ष्‍य  अंतिम नहीं होता।                                   अरमानों    के  बेचैन  आकाश  में ।                                    कहीं कोई मुकम्‍मिल जहां नहीं होता ।

कुछ दोस्‍त थे कुछ रिश्‍ते अपनी पारी निभा गए ।                                 कुछ दीगर आए एहसानों के तीर चला  गए  ।

जो भी चाहा जो भी सोचा हमने हो न सका ।                         

          कुछ  हालात  थे  दुनियादारी   सिखा गए ।

चुनावी कांव- कांव

            आजकल चुनावी वातावरण है । हर तरफ चुनावी खिचड़ी,पुलाव और बिरयानी पक रही है । नेताओं ने पारंपरिक सुअर पार्टी और गधा पार्टी का टिकट प्राप्त करने के लिए एड़ी- चोटी लगा दी ।  सफलता  तो एक-एक को ही मिलनी थी , शेष सब असफल हो गए । असफल लोगों के लिए विकल्प खुले थे वे चाहें तो पार्टी में रहते हुए उसका कबाड़ा कर सकते थे या निर्दलीय खड़े हो कर शकित प्रदर्शन कर सकते थे । ऐसे लोगों के पास दूसरी पार्टियों जैसे उल्लू पार्टी , गिद्ध पार्टी और जूता पार्टियों के विकल्प भी  है । वास्तव में राजनीति कभी भी र्निविकल्प नहीं होती । जिन लोगों ने अपनी अपनी खेमेबाजी, चालबाजी और कलाबाजियों से टिकट का जुगाड़ कर ही लिया है अब वे ही असंतुष्टों को मनाने में लगे है । असंतुष्ट भी रुठी पत्नी की तरह बिना कुछ लेन-देन के कहां मानते है । 
        चुनावी संग्राम का बिगुल बज गया । छोटे कार्यकर्ता अपनी खिचड़ी पकाने में लगे है । सुबह के समय वे गधा पार्टी के दफतर में हेाते है तो शाम को वे सुअरों के साथ घूम रहे होते है । ऐसे कार्यकर्ता तो केवल टोपी और गमछे बदल कर इस अवसर को रोजगार के रुप में देखते है और कुछ कमा लेना चाहते है । पार्टियों को भी भाड़े की भीड की आवश्यकता होती है सो दोनों अपने-अपने कामों को साधने में लग जाते है । इस महासमर में सभी सेनाएं तैयार हो चुकी है । इन सेनाओं के प्रमुख एक दूसरे पर आरोपों के तीर चलाने लगे है । ये आरोप उन्हें पिछले पांच सालों में दिखार्इ नहीं दिए थे । इस युद्ध की भीषणता का अंदाज चर्चाओं, रैलियों और प्रचार से होने लगता है । अब इनके प्रचार और भाषणों से यह मालूम होता है कि हम जनता को क्या कुछ मिलना चाहिए था मगर मिल नहीं पाया । वादों की घनघोर वर्षा के बीच यह समझना कठिन हो जाता है कि कौन सही है और कौन गलत । हेलीकाप्टर वालों की रैलियों को छोटे शहरों में बहुत सफलता प्राप्त होती है । हमारे लल्लन जी एक ऐसी ही रैली से लौटे तो हमने पूछा '' रैली में क्या हुआ ? वे बोले ''अरे .... मिश्राजी... आज हमने हेलीकाप्टर देखा ..... सच में बहुत ही बड़ा था । हमने पूछा ''नेताजी क्या बोले ? वे अपनी ही धुन में थे ,बोले '' नेता क्या बोलते है ? वे जब हेलीकाप्टर से उतरे तो हमने देखा कि अंदर सोफे लगे है ।  हमें ऐसी रैलियों की सफलता का राज़ समझ में आ गया । 
        निर्दलीय नेकीराम बेचारे अब चुनाव में खड़े हो कर भी पछता रहे है । कल वे भी मिल ही गए तो हम पूछ ही बैठे '' इस बार कैसे खड़े हो गए ? वे बोले ''हमें पता लगा था कि बैठने के भी पैसे मिलते है । हम बीच में ही बोल पड़े '' फिर ......। वे बोले '' फिर क्या......? हमें कोर्इ बैठालने के लिए आया ही नहीं । बस अब हम खड़े है ।  हम सोचने लगे कि जिन्हे अपने ही परिवार के भी चार वोट पूरे न मिलने वाले हो उन्हें कोर्इ क्यों बैठाने के लिए पैसे देगा । 
           चुनावों का वातावरण बहुत ही मजेदार होता है । आप कहीं भी निकल जाऐं कोर्इ परिचित हो या अपरिचित बस एक जुमला उछाल दीजिए '' किसका जोर चल रहा है ? बस किसी चैनल के वाद-विवाद की ही तरह चर्चा प्रारम्भ हो जाती है । 
पहला कहता है '' सुअर का जोर है ।
दूसारा बोला '' कैसे मुझे तो नहीं लगता ।
पहला पूरी विद्वता के साथ बताता है '' सुअरों की संख्या अधिक है तो उन्हें जातिगत लाभ मिल रहा है और दूसरा कोर्इ जाति वाला न खड़ा होने से भी सुअर के जीतने के चांस अधिक है । 
तीसरा जो अब तक चुप था चर्चा में कूद पड़ा ''लेकिन सुअर ने किया ही क्या है ?
पहला फिर शुरु हो गया '' देखिए चुनाव में कोर्इ काम-वाम नहीं देखता । फिर वे हर शादी- ब्याह और जलसों में नाचे भी तो बहुत है ।  
दूसरा बोला '' लेकिन गधा भी तो कोर्इ कम नहीं ।
चौथा जो अब तक खामोश था बोला '' गधे की पार्टी वाले ही उसे धोखा दे रहे है । उसके पास तो कार्यकर्ता ही नही है । उसे तो लोग डमी मानते है । 
पहला पक्का सुअरवादी था बोला '' नहीं....नहीं सुअर की टक्कर गधे से ही है ।  
दूसरा बोला '' लेकिन मैने सुना है कि गिद्ध इन दोनों पर भारी पड़ रहा है । 
तीसरा बोला '' हां.... हां  मुझे भी लगता है कि गिद्ध , सुअर और गधे को पीछे छोड़ देगा । 
पहला फिर विद्वान बन गया और तेज-तेज बोलने लगा '' ये सब फालतू की बाते है गधा और गिद्ध एक ही जाति के है तो इनके वोट आपस में कट जाएंगें । जीत तो सुअर की ही होनी है । 
चौथा बोला '' जाति -जाति तो क्या दूसरे लोग तेल लेने जाएंगें ? 
            ऐसी चर्चाऐं कभी पूरी नहीं हो पाती है। इनमें कुछ लोग तो अपना काम ही कर रहे होते है याने प्रचार और कुछ लोग जनता की नब्ज़ टटोलने की कोशिश कर रहे होते है । ऐसी चर्चाऐं गली ,मोहल्ले और नुक्कड़ों पर आज कल आम है । यहां हम ऐसी ही चर्चाओं से अपने शहर का मुड़ समझने की कोशिश पिछले कर्इ दिनों से कर रहे है और बड़ी-बड़ी चैनल वाले न जाने कब आकर सर्वे करके चले गए ? अब  हमें एक बताता  है कि सुअरों का बहुमत होगा और दूसरा गधों का तीसरा गिद्धों के सहयोग से सरकार बनाने की बात करता है । ऐसे अदृश्य सर्वे वाले न जाने कैसे इतने अच्छे ज्योतिष हो जाते है ? न जान हमें कौन धोखा दे रहा  नेता ,पार्टी या ये चैनल वाले ? ऐसा भी तो हो सकता है कि सब मिल कर हमें धोखा दे रहे हो ? बस अब सोच समझ कर मतदान करना ही हमारे हाथ में है।

                                    आलोक मिश्रा

रविवार, 6 अक्टूबर 2013

कालीपुतली बोल रही हूं

कालीपुतली बोल रही हूं
ये गांव से विकसित होता छोटा सा कस्बा था । इस शहर में कुछ सड़कें ऐसी भी थी जिन पर रातों को लोग जाने से कतराते थे । आज मै जहां हूं वहां से ही कभी शहर का वीराना प्रारम्भ होता था । इस शहर कें कुछ कलाकारों नें मुझे कागज पर उकेरा । चि़त्र से निकाल कर मुझे अपने घड़े से छलकते पानी और उसमें भीगते हुए वस्त्रों के साथ फौहारे के बीच चौराहे पर बिठा दिया गया । मेरे काले रुप ने मुझे एक अलग ही आकर्षण और कलात्मक रुप प्रदान कर दिया । फिर न जाने किसने मुझे नाम दे दिया ''कालीपुतली। तब से आज तक मैं बस आप लोगों को आते-जाते हुए देख रही हुं । आज यह चौक मेरे ही नाम से जाना जाता है । मै दुनिया भर में और कहीं भी नहीं केवल और केवल यहीं हूं । विश्वस्तरीय कलाकरों की नज़र मुझ पर नहीं पड़ी । इसका कारण मेरी या मेरे बनाने वाले की कोर्इ कमी न होकर इस क्षेत्र का अपेक्षाकृत पिक्षड़ा होना है । कभी मंै सोचती थी कि कला के कद्रदान जरुर ही मेरे आसपास जमा हुआ करेंगे लेकिन ऐसा हो न सका ।
अब बदलते प्रशासनों के बीच कभी मैं जगमगाती रोशनी में रोज ही नहाती हुं तो कभी पानी की एक बूंद और रोशनी को तरस जाती हुं । कुछ लोग मुझे नारी के अपमान के रुप में देखते है उन्हें मेंरा यहां बैठे रहना अच्छा नहीं लगता तो कुछ लोग मुझे यहां की संस्कृति से जोड़ कर देखते है । मेरे लिए विवादों का होना या न होना कोर्इ मायने नहीं रखता । मंै चुपचाप अपने घड़े के साथ एक पैर आगे की ओर किए हुए उठने को उ़द्धयत निर्विकार भाव से नवनिर्मित अहिंसा द्वार की ओर निहारती हुर्इ बैठी हुं । मुझे किसी की प्रतिक्षा नहीं है पर लगता है कि मंै किसी की अनंत प्रतिक्षारत हूं ।
अब मेरे आसपास पहले सा शांत वातावरण नहीं रहा । शहर के कोलाहल से मेरे साथ ही साथ बड़े-बड़े महान लोग जो चौराहों पर विराजमान है अब परेशान दिखार्इ देते है । शहर भर में होने वाले धार्मिक, सामाजिक और राजनैतिक कार्यक्रम मेरे सम्मुख आए बिना समाप्त ही नहीं होते । वे डी.जे. की धुन पर शैतानों की तरह नाचने का पुनीत कर्म करते हुए आस-पास के लोगों की तकलीफों को भूल जाते है । यातायात रुकता है तो रुके उनकी बला से ..... उन्हें नाचना है....... तो बस नाचना है । उस पर तुर्रा यह कि मेरे आस-पास कान फोडू फटाके फोड़ना भी आवश्यक ही है । यदि इस दौरान कोर्इ चैनल या समाचार पत्र का कैमरा नज़र आ जाए तो समझ लीजिए गदर ही हो गया । बाजू वाले को धक्का दे दो उसकी पीठ पर चढ जाओ लेकिन कैमरे में दिखना जरुरी है ।
ऐसा नहीं कि मेरे आस-पास केवल इसी तरह के आयोजन होते है । आजकल मेरे ठीक सामने कुछ धरने प्रदर्शन और आंदोलनों के पंड़ाल भी लगाए जाने लगे है । ये धरने, प्रदर्शन और आंदोलन ,प्रशासन और उन लोगों तक आवाज पहुंचाने के लिए होते तो उन अधिकारियों के दफतर या उन लोगों के घरों के सामने होते । ये सारे आंदोलन तो आपको गुमराह करने के लिए या अपनी नेतागिरी चमकाने की नियत से होते है । इन पंडालों में अधिकांशत: तो पाच -दस लोग ही बैठ कर पूरे शहर या क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने का दावा करते है । मेरे सामने बैठने वालों को रास्ता चलने वालों की भीड़ मुफत में मिल जाती है और मुफत का माल कोर्इ छोड़ता है क्या ?
मेरे आस -पास जिंदाबाद -मुर्दाबाद के नारे लगाते लोगों की भीड़ अक्सर ही आती- जाती रहती है । कभी-कभी तो भीड़ अपने किसी नाते- रिश्तेदार का पुतला लाकर किसी शमशान घाट की तरह ही मेरे सामने जलाती है या जलाने का प्रयास करती है । ऐसे पुतले अक्सर ही भीड़ से अधिक पुलिस को प्रिय होते है इसलिए उसके जलते ही उसे बचाने के लिए पुलिसवाले बड़ी ही बेर्इज्जती के साथ जूतों से रौंद -रौंद कर उसे बुझाने का प्रयास करते देखे जाते है । ऐसे समय पर यदि आप पुतले से नज़र हटा कर मेरे चेहरे की ओर देखें तो आपको मेरी मुस्कान भी साफ दिखार्इ देगी । अब मेरे आस-पास मेरी कुछ संगी- साथी भी सब्जी -भाजी बेच कर गुजर -बसर करने का प्रयास करने लगी है । उनके होने से मेरा अकेलापन दूर हो जाता है । आजकल विज्ञापनों के जमाने में लोग मेरे आस-पास इतने अधिक बैनर और पोस्टर लगाते है कि आप लोगों का ध्यान मुझ पर जा ही नहीं पाता ।
शामों को मेरे दाहिनी ओर से अध्ययन करके लौटते छात्र जहां मन को प्रसन्न कर देते है वहीं बायीं ओर जाम से जाम टकराने वाली टोलियां मुझे शर्मिन्दा करती है ।मेरी पीठ की ओर से आती हुर्इ सड़क को मेरे लिए देख पाना सम्भव नहीं हो पाता । उस ओर से आने वाले लोगों की नज़रें मुझे अपनी पीठ पर चुभती हुर्इ लगती है तेा मै शर्म से पानी -पानी हो जाती हूं । गंदगी से बजबजाते पार्क से कुछ दूर ठेलों और खोमचे वालों की धमाचौकड़ी और अस्तव्यस्त से आवागमन के बीच मंै बैठी हूं । मंै कालीपुतली बोल रही हूं ..... इस वातावरण में मंै बैठी हूं ........ऐसा आपको लगता है । एक बार ध्यान से देखिए........ मैं बैठी हूं....... या ......उठने का प्रयास कर रही हूं । यदि आपकी नज़रों में कला को देखने और परखने की योग्यता है और आप कला, सौन्दर्य और संस्कृति के स्वरुप को एक ही स्थान पर देखना चाहते है तो एक नज़र मुझ पर ड़ालें । मैं कलीपुतली हूं..........।

आलोक मिश्रा
 — with Abha Mishra and 18 others.
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शुक्रवार, 19 जुलाई 2013

sabjee bajar

सब्जी बाजार
     हम सामाजिक रुप से बहुत ही  समृद्ध होते जा रहे है । अब हमारी सामाजिक समृद्धता चाय-पान के ठेलों ढाबों और सब्जी बाजारों में दिखार्इ देती है। सामान्यत: मध्यमवर्गीय व्यकित ऐसे ही स्थानों का प्रयोग आज - कल मिलने - जुलने और सामाजिक सदभावना बढाने के लिए करता हुआ देखा जाता है । इसी चक्कर में या फिर घर और बीबी के झंझटों से परेषान हमारा आम आदमी हाथ में थैला पकड़ें बाजार और खासकर सब्जी बाजार में ही दिखार्इ देता है । वो अक्सर ही वास्कोडिगामा की तरह महंगार्इ के जमाने में सस्ते सामान की दुकानों की खोज करता हुआ पाया जाता है । बस वो खोजता रहता है .... खोजता रहता है .... यहां से वहां ...... वहां से यहां .... खोजता रहता है ।
             साहब मजा तो सब्जी बाजार में आता है। नीचे जमीन पर बैठे ,ठेले वाले और कच्ची-पक्की दुकान वाले दुकानदार खरीददारों को आकर्षित करने के लिए नए - नए प्रयोग करते है । पालक ले लो ∙ ∙......;धनिया  है हरा- हरा.....; .अराररा ∙∙ .... पूरा बिक गया ...... ;आज तो सेम का बाजार∙∙....... आ जाओ........आजाओ......। सभी हांकों की मिली-जुली आवाजों की संगति कभी पा∙..धा∙∙..नी∙∙∙..सा∙∙∙∙.. सी सुरीली तो कभी आधुनिक गीतों की ओर ध्यान खीचती है । इन्हीं के बीच हमारा आम आदमी बाजार में दिखार्इ देता है । आपको तो मालुम ही होगा कि खास लोग जैसे नेता , अधिकारी ऐसे बाजारों में कभी भी दिखार्इ नहीं देते । अगर ये आपको दिख जाए तो समझ लीजिए कि इनके बुरे दिन चल रहे होंगे। कर्इ बार सोचा कि आखिर ये लोग इतने असामाजिक प्राणी क्यों होते है ? क्या इनकी रसोर्इ में सब्जी -भाजी नहीं पकती है ? फिर सोचा जनता का खून पी कर जीने वालों को सब्जी -भाजी की जरुरत ही क्या है ? फिर कुछ लोग अपने घरों की सब्जी से अधिक इनके घरों की सब्जी पहुंचाने की चिन्ता करते है और पहुंचाते रहते है । आदि... आदि... खैर छोडि़ए ।
             हां साहब तो हम कहां थे .... सब्जी बाजार में  । अचानक ही आज - कल कुछ सबिजयों के भाव बढने लगे तो सब को आषंका होने लगी कि कहीं चुनाव -वुनाव तो नहीं आ गए । पिछली बार प्याज के आंसूओं में सरकार का बहना किसी सुनामी से कम तो न था । तो साहब खेती - किसानी से अधिक कि्रकेट पर ध्यान देने वाले मंत्री जी वही है लेकिन प्याज की जगह टमाटर ने ले ली । हमारे एक सगे से सौतेले साथी है के.पी. सक्सेना । उनका अपहरण हो गया पिछले दिनों । फिरौती में अपहरण कर्ताओं ने प्याज मांगे थे । अब हम है कि टमाटर का भाव पूछते समय अगल -बगल देख लेते है। फिर तुरन्त ही याद भी आ जाता है कि हम उत्तरप्रदेष या बिहार में नहीं है तो भय थोड़ा कम हो जाता है । यहां लोगों के थैलों के साइज से ही अंदाज लगाया जा सकता है कि कौन कितना बड़ा आसामी है । वर्मा जी तो हमेषा ही दो बड़े-बड़े थैलों को भर के सब्जी खरीदते है । इनकी ऊपर की आमदनी बहुत होगी । वो देखिए तांड़े जी को आधे-एक घंटे से केवल भाव ही पूछ रहे है ; सब्जी लेने की तो हिम्मत ही नहीं जुटा पाए । एक षिक्षक की खरीददारी ऐसी ही होती है । मिसेस जोषी ... आप मिस्टर जोषी को नहीं जानते ...अरे वही जो राजस्व में है ... अरे वही जो हर बड़े अधिकारी के खास बन जाते है । हां ... तो मिसेस जोषी पूरी सजधज के साथ ही सब्जी बाजार में दिखार्इ देती है । उन्होने दो किलो टमाटर तौलने को क्या कहा सबका ध्यान ही अपनी ओर खींच लिया । वे समझते हुए भी बेफिक्र सी अपने साथ आर्इ नौकरानी को बोली ''ठीक से छांटना । अब तो सबको यह मालूम हो गया कि छोटी वेतन में भी मेम साहब पूरे ठाठ - बाट और नौकर-चाकरों के साथ सुखपूर्वक जीवनयापन कर रही है । इस बाजार से कुछ बड़े सेठ साहुकार तो चोरी-चोरी थोड़े से टमाटर खरीद कर ले जा रहे थे । बाद में मालूम करने पर सूत्रों के हवाले से जानकारी प्राप्त हुर्इ कि उन लोगों को लगता है कि कहीं कोर्इ उन्हे अधिक टमाटर खरीदता हुआ देखकर इन्कम टैक्स , सीबीआर्इ और लोकायुक्त को षिकायत न कर दे ।
             इसी सब्जी बाजार में कुछ ऐसे भी लोग है जो इंतजार कर रहे है कि कब दुकानदार के पास न तौलने लायक कुछ बचेगा । वे ऐसे मौके पर ही दुकान से कुछ खरीद कर अपने बच्चों को सब्जी नसीब करवा पाते है ।
           सब्जी बाजार एक बहुआयामी  जगह है । यहां खरीदने और बेचने वाले अपने-अपने जीवन की कथा के कुछ दृष्यों के साथ जी रहे होते है । वे अपस में मिल रहे होते है ,सुख-दुख जान रहे होते है और एक दूसरे से प्रतियोगिता भी कर रहे होते है । यहां कुछ लोग कुछ छुपा रहे होते है तो कुछ लोग कुछ दिखावा करने में व्यस्त होते है । यहा के उठते -गिरते भाव जितने खरीददारों को प्रभावित करते है उतने ही बेचने वालों को भी । जो इन भावों से अछूते रह जाते है ; वे ही इस सब्जी बाजार में कभी दिखार्इ नहीं देते है ।
                                         आलोक मिश्रा

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2013

घोषणा मंत्रालय

आपको तो यह मालूम ही होगा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में आपका क्या स्थान है । यदि आप नेता नहीं है ,यदि आप जीवन भर चुनाव लड़ कर जीत नहीें सकते तो आप आम आदमी है । अरे... अरे... भार्इ आप अपने आपको नर्इ नवेली पार्टी का आम आदमी न समझ लेना । आम आदमी वही होता है ,जिसे आवेदन- पत्र लिखना आता है । जिसे झिड़कियां सुनना आता है । जो किसी भी लार्इन में घंटों तक बिना षिकायत खड़ा रह सकता है ; जिसके चुनाव के समय खास लोग पैर छूते घूमते रहते है । ऐसे अवसरों पर आम आदमी के कल्याण के लिए खास लोग घोषणाएं किया करते है । ये अलग बात है कि घोषणाएं केवल घोषणाओं के लिए ही होती है , अमल में लाने के लिए नहीं । गरीबी और महंगार्इ समाप्त करने की घोषणा तो पैसठ सालों से वैसी की वैसी ही है । ऐसा लगने लगा है कि ये भी नेताओं की ही तरह स्थार्इ समस्या है । राजनैतिक लोगों को चुनाव की गंध वैसे ही मिलने लगी है जैसे कि मेंढकों को बारिष की मिलती है । अब वे उछल-कूद करने लगे है अरे... अरे... मेंढक नहीं। नेताओं ने अपनी टोपियों की धूल झाड़ ली है । बाज़ार में कुर्तों के दाम बढने लगे है । वे अब घूम-घूम कर सब को याद दिला रहे है कि वे कब-कब किस-किस के काम आए है । सत्ता में बैठे लोग हमेषा की ही तरह जनता के टैक्स की कमार्इ का उपयोग स्वयम के विकास के पोस्टर ,बैनर और विज्ञापनों पर खर्च करने को अपना अधिकार मानते हुए, अब फिर करने लगे है । एक समाचार के अनुसार यह फैसला लिया गया है कि आगामी चुनावों को देखते हुए चुनाव के पूर्व विधिवत अस्थार्इ घोषणा मंत्रालय गठित किया जा रहा है।घोषणा मंत्री का काम होगा कि यह देखे कि किस क्षेत्र विषेष में किस प्रकार की घोषणाओं से वोट प्राप्त किए जा सकते है । वे अब जनता के बीच से घोषणाओं हेतु मुददे खोज कर अपने मंत्रियों तक पहुचाते है । चुनाव की व्यस्तता के कारण अक्सर तो मंत्रीजी उन्हे पढ और समझ भी नहीं पाते । वे सभा के दौरान ही पढते है । इससे अजीब-अजीब घोषणाएं भी हो जाती है । इसी तरह वे एक ष्षहर में घोषणा करते-करते चूक गए । उन्हें बोलना था कि मै घोषणा करता हुं कि मेरी और मेरी पत्नी की सम्पतित सार्वजनिक की जावेगी । वे बोल गए '' मेरी पत्नी सार्वजनिक की जावेगी। कहीं वे महिलाओं को फ्री में बेलन देने की बाते कर गऐ तो कहीं पत्नी पीडि़त पतियों को आरक्षण देने की । घोषणा मंत्रालय की रिसर्च टीम के अनुसार लोगों को बिजली ;सड़क; पानी और षिक्षा की समस्याओं के साथ ही साथ भ्रष्टाचार से मुकित चाहिए । मंत्री जी अपने पी.ए. से बोले '' बिजली ,पानी,सड़क और षिक्षा की जितनी और जो-जो घोषणाए लिखनी हो लिख लेना लेकिन भ्रष्टाचार की बात न करना वर्ना चुनाव लड़ने का फायदा ही क्या । यह भी कि चुनाव के बाद घोषणा मंत्रालय को ही तो भ्रष्टाचार मंत्रालय में बदलना है । जनता को मालूम है कि पिछले चुनाव के पहले दो सौ स्थानों पर विभिन्न निर्माण कार्यों की घोषणा और भूमि पूजन एक ही स्थान पर हुआ था । उसमें से अनेकों सड़के पहले तो कुछ चलने योग्य भी थी अब वे पांच साल से निर्माण की बाट जोहती उखड़ी हुर्इ पड़ी है । पिछले बार जब मंत्री जी ने लगातार बिजली देने की घोषणा की तो उनके जाते ही सब लोग चार दिन तक अंधेरे में रहे थे । पानी की तो कोर्इ कमी नहीं है बस उसे लाने के लिए दो किलोमीटर जाना पड़ता है । षिक्षा बहुत ही अच्छी है बच्चे खाना खाने स्कूल आते है । पढने-पढाने की तो कोर्इ बात ही नहीं है । षिक्षा सुविधा का चारा वोट रुपी मछली के गले में अटका ही समझो । आम आदमी उनकी घोषणाओं का भरपूर आनन्द लेने को तैयार है । किसी सभा में उनकी किराए की भीड़ के बीच जब वे घोषणाएं कर रहे होते है तब आप अपने बच्चों के साथ घूम-घूम कर चने और चाट आदि का आनन्द ले रहे होते है । आप को तो उन की घोषणाओं में कोर्इ रुचि नहीं है । वे भी अपनी की हुर्इ घोषणाओं को दुबारा पलट कर देखते भी है या नहीं ? यदि देख लेते तो उन्हें बार-बार वही सब न कहना पड़ता । कुछ भी हो घोषणा मंत्रालय की सकि्रयता देखते ही बनती है । जो भी हो ये घोषणाएं अगले कुछ दिनों तक तो आपको बताती रहेंगी कि हम सुनहरे कल की ओर बढ रहे है । बस चुनाव के बाद यह कल पांच साल बाद ही आएगा । आज तो मजे ले ही लो । कल इन घोषणावीरों के आपको और हमें दर्षन हों या न हों ; आप इन घोषणाओं का लेखा-जोखा रख सकते है लेकिन उन्हें कुछ भी याद नहीं रहेगा । यही तो लोकतंत्र की मूलभूत विषेषता है । आलोक मिश्रा