कहानी
संदेष
वो थोड़ी देर मुझे अपलक देखती रही और फिर उठ कर अंदर चली गर्इ । मै जहां बैठा हुं यह एक झुग्गी बस्ती में झोपड़ी है । मै यहां कैसे हुं ? इसकी कहानी दो या तीन वाक्य की ही है । कुछ ही दिनों पहले सुभाष से मेरी मित्रता हुर्इ है । आज अचानक ही सुभाष ने मुझे यहां भेजा है ये बताने के लिए कि उसकी तबियत बहुत खराब है । मंै इसी संदेश के साथ खोजता हुआ यहां पहुचा हुं । मै जिस महिला से मिला, उसने अपना नाम उमा बताया ; सांवली, तीखे नैन-नक्श ,उम्र यही कोर्इ बत्तीस-तैतीस । मैने जैसे ही संदेश दिया वो बोल पड़ी '' हां........हां तबियत खराब है ,अब वो अपनी बीबी के पल्ले में घुसा रहेगा । तबियत खराब ही है तो यहां आकर भी तो सो सकता था । मुझे लगा शायद मुझे यहां नहीं आना चाहिए था । वो मुझ से बोली '' अरे........ आप बैठ जाइए न बाबा....... । हा..... तो क्या हुआ सुभाष को ? मेरा दिमाग ''बाबा के विश्लेषण में लगा था और सीधे प्रश्नों के लिए तैयार नहीं था ; मैं चुप ही रहा । वो फिर बोली '' मै आपको कुछ थोड़े ही कह रही हुं .......। पानी पिऐंगे ? मैने हां में सर हिलाया ।
उमा पानी लेकर आ गर्इ । पानी पीते हुए ध्यान दिया कि ये एक छोटी झोपड़ी है, दो भागों में बंटी हुर्इ ;शायद अंदर चौका और सामान रखने का कमरा हो । उमा ने मेरी निगाहों को पकड़ ही लिया । वो हाथ के इशारे के साथ ही बोल पड़ी '' यही है सुभाष का दिया हुआ महल और मै इसकी रानी हु । मै उठने लगा तो वो पूरे अधिकार के साथ बोली '' आप बैठ जाइए न ..........बाबा । मै वहीं पड़ी खटिया पर बैठ गया । वो भी मेरे पास ही जमीन पर बैठ गर्इ । वो शायद बातों का सिलसिला आगे बढाना चाहती थी । उसने पूछा '' हां .....तो क्या हुआ प्रभात को ? मै धीरे से बोला ''शायद ......शायद बुखार ........... । '' शायद ...... क्या मतलब है .... ? कैसे दोस्त हो ?....... पूरा पता किए बगैर ही आ गए । वो बीच में ही बोल पड़ी । मै फिर उठने की कोशिश करने लगा । वो बोली '' अरे बैठो न ..........बाबा । मै खटिया से आधा ही उठा था फिर बैठ गया । उमा ने प्रश्न बदल दिया '' क्या तुम्हें सुभाष ने मेरे बारे में कुछ बताया ?...... क्या बताया ? मै सोचने लगा क्या बताउ । वो शायद पूछने से अधिक बताना चाहती थी । वो बोले बगैर भी कहा रह सकती थी '' उसने मेरे बारे में तुम्हें बताया तो होगा कि मैं उसकी प्रेमिका हुं .........उसकी पत्नी के अलावा प्यार .....। आप लोग मुझे न जाने किस -किस नाम से पुकारते हो .......। उसकी अवााज कम होती हुर्इ बंद हुर्इ। वो मेरी आंखों में प्रतिकि्रया देखने का प्रयास करने लगी । उसे कुछ मिला या नहीं मुझे शराब की गंध अवश्य महसूस हुर्इ । मै क्या कहता वो बोले जा रही थी '' आपको संकोच हो रहा है न .....बाबा । उसकी पत्नी वहां हवेली में रहती है ;मै दूसरी हु न तो मेरे लिए ये है झोपड़ा । अब मै बीच में बोल पड़ा '' मुझे जाना होगा जल्दी में हु । वो पूरे अधिकार से बोली '' जाना तोे सबको ही है लेकिन मै सुभाष से पहले जाउंगी ।...... हां तो आप को ड़र लग रहा है या शर्म आ रही है । मुझे खुद पर विश्वास है आपको है न तो बैठो न .........बाबा । ड़रने की कोर्इ बात नहीं है । सबसे र्इमानदार और बेबस लोग ऐसी ही बस लोग ऐसी ही जगहों पर रहते है । मै कसमसा कर बैठ गया । उसका बोलना जारी था '' अब यहां कोर्इ नहीं आता। पहले-पहल शरीफजादे आते थे । मैं तो सुभाष को ही चाहती हु न । अब कोर्इ नहीं आता। मै मन की बात करने को भी तरस जाती हुं । आप आए है तो आ को लगता होगा कि मैं बहुत बोलती हुं मन की बात करने को भी तरस जाती हुंं । मै तो बस मोहल्ले के बच्चों से ही बात करके मन बहला लेती हु। मैं न चाहते हुए भी बोल ही पड़ा '' और तुम्हारे बच्चे ? वो अपनी ही लय में थी '' मेरे बच्चे ......... नहीं है । होने ही नहीं दिये । मैं तो बस मोहल्ले के बच्चों से ही बातें करके मन बहला लेती हु । मुझ से फिर बोले बगैर नहीं रहा गया '' और सुभाष भी तो रहते होगें । उसने बुरा सा मुंह बनाया '' आता है दिन में एक-दो बार । रात को तो वो अपनी बीबी के पल्ले में ही घुसा रहता है । वहीं सोता है । मैं तो अकेली रहती हुं रातों को भी और अपने आप से ही बात करती रहती हुं । रातों को ड़र भी बहुत लगता है। अक्सर ही मैं नशे में खुद से ही बातें करती हुं । अक्सर तो मै बात करने को भी तरसती रहती हुं ।
फिर वो अपलक मुझे देखने लगी जैसे मेरे भावों को पढ़ने की कोशिश कर रही हो। मेरे निर्विकार चेहरे ने उसे निराश ही किया होगा । वो उठी और अंदर चली गर्इ । अंदर से टीन की संदूक खुलने की आवाज आर्इ और फिर बंद होने की भी । उमा वापस कमरे में आर्इ तो उसके हाथ में मुड़ा हुआ अखबार था । वो मेंरे पास आकर अखबार खोलने लगी । उसमें एक बुजुर्ग आदमी की फोटो थीे । उसने फोटो को चूमा , पैर भी छुए और बिना मेंरी ओर देखे कहा '' ये मेरे पापा है । बस अब ये ही मेंरे अकेलेपन में मेरे साथ होते है । मैं अपनी सब बात इन्हें ही बताती हुं । मैने युं ही कहा '' बहुत ही अच्छे है ........ कहां है अभी? उसने जवाब दिया '' थे । मै बोला '' याने ....... अब नहीं हैं। उमा बोली '' नहीं...... वे मुझे बहुत प्यार करते थे और मै सुभाष को । मै सुभाष की राधा ,मीरा और गोपी थी । मै इसके साथ भाग आर्इ । मेरे पिता मेरे आने के चौथे दिन ही मर गए । वो मरे नहीं मैने उन्हें मार ड़ाला । मै दोषी हुं उनकी मौत की । उन्होंने मरते समय मुझे श्राप दिया होगा तभी तो मै आज अकेलापन झेलने को मजबूर हुं । मुझे यह भी लगता है कि पापा मुझे श्राप नहीं दे सकते । ये तो मेरी ही करनी का फल है जो मै भोग रही हुं । मुझे लगता है मुझ जैसी बेटी भगवान किसी बाप को न दे । शायद कोर्इ और होता तो इसे बहाना,झूठ और फरेब का तरीका ही समझता लेकिन मुझे उसकी आंखों के कोर पर आंसुओं की सच्चार्इ ही दिखार्इ दी अचानक ही अपने अतीत से बाहर आ गर्इ और बोली '' मै भी कहां आपको बोर करने लगी । अच्छा अब आप जाइए .........बाबा । मै और मेरे पापा अकेले में आपस में बातें करेंगे । मै झोपड़ी से निकला तो आस-पास के लोगों ने मुझे अजीब सी नजरों से देखा । मै गया तो था संदेश देने मगर अपने साथ एक संदेश लेकर भी जा रहा हुं ।
आलोक मिश्रा