शुक्रवार, 19 अप्रैल 2013
घोषणा मंत्रालय
आपको तो यह मालूम ही होगा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में आपका क्या स्थान है । यदि आप नेता नहीं है ,यदि आप जीवन भर चुनाव लड़ कर जीत नहीें सकते तो आप आम आदमी है । अरे... अरे... भार्इ आप अपने आपको नर्इ नवेली पार्टी का आम आदमी न समझ लेना । आम आदमी वही होता है ,जिसे आवेदन- पत्र लिखना आता है । जिसे झिड़कियां सुनना आता है । जो किसी भी लार्इन में घंटों तक बिना षिकायत खड़ा रह सकता है ; जिसके चुनाव के समय खास लोग पैर छूते घूमते रहते है । ऐसे अवसरों पर आम आदमी के कल्याण के लिए खास लोग घोषणाएं किया करते है । ये अलग बात है कि घोषणाएं केवल घोषणाओं के लिए ही होती है , अमल में लाने के लिए नहीं । गरीबी और महंगार्इ समाप्त करने की घोषणा तो पैसठ सालों से वैसी की वैसी ही है । ऐसा लगने लगा है कि ये भी नेताओं की ही तरह स्थार्इ समस्या है ।
राजनैतिक लोगों को चुनाव की गंध वैसे ही मिलने लगी है जैसे कि मेंढकों को बारिष की मिलती है । अब वे उछल-कूद करने लगे है अरे... अरे... मेंढक नहीं। नेताओं ने अपनी टोपियों की धूल झाड़ ली है । बाज़ार में कुर्तों के दाम बढने लगे है । वे अब घूम-घूम कर सब को याद दिला रहे है कि वे कब-कब किस-किस के काम आए है । सत्ता में बैठे लोग हमेषा की ही तरह जनता के टैक्स की कमार्इ का उपयोग स्वयम के विकास के पोस्टर ,बैनर और विज्ञापनों पर खर्च करने को अपना अधिकार मानते हुए, अब फिर करने लगे है ।
एक समाचार के अनुसार यह फैसला लिया गया है कि आगामी चुनावों को देखते हुए चुनाव के पूर्व विधिवत अस्थार्इ घोषणा मंत्रालय गठित किया जा रहा है।घोषणा मंत्री का काम होगा कि यह देखे कि किस क्षेत्र विषेष में किस प्रकार की घोषणाओं से वोट प्राप्त किए जा सकते है । वे अब जनता के बीच से घोषणाओं हेतु मुददे खोज कर अपने मंत्रियों तक पहुचाते है । चुनाव की व्यस्तता के कारण अक्सर तो मंत्रीजी उन्हे पढ और समझ भी नहीं पाते । वे सभा के दौरान ही पढते है । इससे अजीब-अजीब घोषणाएं भी हो जाती है । इसी तरह वे एक ष्षहर में घोषणा करते-करते चूक गए । उन्हें बोलना था कि मै घोषणा करता हुं कि मेरी और मेरी पत्नी की सम्पतित सार्वजनिक की जावेगी । वे बोल गए '' मेरी पत्नी सार्वजनिक की जावेगी। कहीं वे महिलाओं को फ्री में बेलन देने की बाते कर गऐ तो कहीं पत्नी पीडि़त पतियों को आरक्षण देने की । घोषणा मंत्रालय की रिसर्च टीम के अनुसार लोगों को बिजली ;सड़क; पानी और षिक्षा की समस्याओं के साथ ही साथ भ्रष्टाचार से मुकित चाहिए । मंत्री जी अपने पी.ए. से बोले '' बिजली ,पानी,सड़क और षिक्षा की जितनी और जो-जो घोषणाए लिखनी हो लिख लेना लेकिन भ्रष्टाचार की बात न करना वर्ना चुनाव लड़ने का फायदा ही क्या । यह भी कि चुनाव के बाद घोषणा मंत्रालय को ही तो भ्रष्टाचार मंत्रालय में बदलना है ।
जनता को मालूम है कि पिछले चुनाव के पहले दो सौ स्थानों पर विभिन्न निर्माण कार्यों की घोषणा और भूमि पूजन एक ही स्थान पर हुआ था । उसमें से अनेकों सड़के पहले तो कुछ चलने योग्य भी थी अब वे पांच साल से निर्माण की बाट जोहती उखड़ी हुर्इ पड़ी है । पिछले बार जब मंत्री जी ने लगातार बिजली देने की घोषणा की तो उनके जाते ही सब लोग चार दिन तक अंधेरे में रहे थे । पानी की तो कोर्इ कमी नहीं है बस उसे लाने के लिए दो किलोमीटर जाना पड़ता है । षिक्षा बहुत ही अच्छी है बच्चे खाना खाने स्कूल आते है । पढने-पढाने की तो कोर्इ बात ही नहीं है । षिक्षा सुविधा का चारा वोट रुपी मछली के गले में अटका ही समझो ।
आम आदमी उनकी घोषणाओं का भरपूर आनन्द लेने को तैयार है । किसी सभा में उनकी किराए की भीड़ के बीच जब वे घोषणाएं कर रहे होते है तब आप अपने बच्चों के साथ घूम-घूम कर चने और चाट आदि का आनन्द ले रहे होते है । आप को तो उन की घोषणाओं में कोर्इ रुचि नहीं है । वे भी अपनी की हुर्इ घोषणाओं को दुबारा पलट कर देखते भी है या नहीं ? यदि देख लेते तो उन्हें बार-बार वही सब न कहना पड़ता । कुछ भी हो घोषणा मंत्रालय की सकि्रयता देखते ही बनती है । जो भी हो ये घोषणाएं अगले कुछ दिनों तक तो आपको बताती रहेंगी कि हम सुनहरे कल की ओर बढ रहे है । बस चुनाव के बाद यह कल पांच साल बाद ही आएगा । आज तो मजे ले ही लो । कल इन घोषणावीरों के आपको और हमें दर्षन हों या न हों ; आप इन घोषणाओं का लेखा-जोखा रख सकते है लेकिन उन्हें कुछ भी याद नहीं रहेगा । यही तो लोकतंत्र की मूलभूत विषेषता है ।
आलोक मिश्रा
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